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भगवान महावीर की वाणी / bhagwan mahavir ki vani / ebig24blog

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भगवान महावीर की वाणी / bhagwan mahavir ki vani

सन्तो की वाणी

भगवान महावीर की वाणी

ज्ञानी होने का सार यही है, कि वह किसी भी प्राणी की हिंसा न करें । इतना जानना ही पर्याप्त है कि अहिंसामूलक समता ही धर्म है अथवा यही अहिंसा का विज्ञान है । mahavir-ji-ki-vani

सभी जीव जीना चाहते हैं मरना नहीं इसलिए प्राणवध को भयानक जानकर निग्रन्थ उसका वर्णन करते हैं ।

जैसे तुम्हें दुःख प्रिय नहीं है, वैसे ही सब जीवों को दुख प्रिय नहीं है – ऐसा जानकर पूर्ण आदर और सावधानीपूर्वक आत्मोपम्य की दृष्टि से सब पर दया करो ।

जीव का वध अपना ही वध है जीव की दया अपनी ही दया है । अतः आत्महितेषी (आत्मकाम) पुरुषों ने सभी तरह की जीव-हिंसा का परित्याग किया है ।

जिसे तु हननयोग्य मानता ह,ै वह तू ही है जिसे तू आज्ञा में रखने योग्य मानता है वह तू ही है ।

जिनेश्वर देव ने कहा है-राग आदि की अनुत्पत्ति अहिंसा है और उसकी उत्पत्ति हिंसा है ।

हिंसा करने से अध्यवसाय से ही कर्म का बंध होता है फिर कोई जीव मरे या न मरे ।

आत्मा ही अहिंसा है आत्मा ही हिंसा है-यह सिद्धांत का निश्चय है जो प्रमत्त है, वह अहिंसक है जो प्रमत है, वह हिंसक है ।

मुनि ने कहा : पार्थिव ! तुझे अभय और तू भी अभयदाता बन । इस अनित्य जीवलोक में तू क्यों हिंसा मैं आसक्त हो रहा है । mahavir-ji-ki-vani

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