Home Santo Ki Vani श्री रामचन्द्र जी के विचार / ramchandra ji ki vani – shri ramchandra ji ke updesh

श्री रामचन्द्र जी के विचार / ramchandra ji ki vani – shri ramchandra ji ke updesh

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श्री रामचन्द्र जी के विचार / ramchandra ji ki vani - shri ramchandra ji ke updesh

सन्तो की वाणी

श्री रामचन्द्र जी के विचार

ramchandra ji ki vani – shri ramchandra ji ke updesh

सन्तो की वाणी में आपको भारत के सन्त और महापुरूषों के मुख कही हुवी व लिखे हुवे प्रवचनों की कुछ झलकियां आपके सामने रखेंगे । आप इसे ग्रहण कर आगे भी शेयर करें जिससे आप भी पुण्य के भागीदार बने ।

श्रीराम हनुमान को बताते हैं, तुम समस्त प्राणियों में जिस जीवात्मा को देखते हो, वह परमात्मा का ही प्रतिबिम्ब है। क्या तुम प्रत्येक सरोवर या सरिता में आकाश को ही प्रतिबिम्बित नहीं देखते ? ramchandra-ji-updesh

परमात्मा स्थिर आकाश है। इसके प्रतिबिम्ब शाश्वत नहीं हैं। जिस प्रकार मात्र आकाश की सत्ता है, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मा ही एकमात्र सत्य है। समस्त दृश्यमान वस्तुएँ इसके ही प्रतिबिम्ब हैं।

मैं परमात्मा हुँ और तुम मेरे प्रतिबिम्ब हो। मैंने अभी तुम्हें जिस महान गुह्य तत्व को बताया है, उसे उन लोगों में कभी प्रकट न करना, जिनकी मुझ पर भक्ति नहीं हैं; भले ही वे तुम्हें इसके बदले में एक साम्राज्य ही क्यां न दे दें। इससे बढकर और कोई उपदेश नहीं है, जो तुम्हें प्रदान कर सकता हूँ।

मात्र रस्सी ही सत्य है, सर्प मिथ्या है। इसी प्रकार मात्र परमात्मा ही यथार्थ है, यह संसार अयथार्थ हैं। यह संसार मनुष्य की दृष्टि, श्रुति और विचारों में यथार्थ प्रतीत होता है; पर इसकी सत्ता सपने में देखी गयी वस्तुओं की सत्ता के समान ही होती हैं।

आत्मा शरीर, इन्द्रियों, मन और प्राण से निश्चित रूप में भिन्न है। यह आन्नदपूर्ण, चरम, शाश्वत, निराकार, निरंजन और शुद्ध है। जिस क्षण तुम्हें इसकी अनुभूति होगी, उसी क्षण तुम मुक्त हो जाओगे।

अपने गुरू के विवेकयुक्त वचनों को श्रद्धापूर्वक सुनते हुए परमात्मा और जीवात्मा के अभेदत्व का अनुभव करने का प्रयास करो। उनका उपदेश है, तत् त्वम असि (तू वह है) इस स्थिति तक पहुँचने के लिए सर्वोपरि तूम्हें गुरू की कृपा प्राप्त करना आवश्यक है।

उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए तुम्हे पहले तत त्वम असि शब्दों का अर्थ समझ लेना चाहिए तत् का अर्थ है परमात्मा, त्वम् का अर्थ है जीवात्मा और असि का अर्थ है, है। इस प्रकार यह अर्थ होता है कि परमात्मा और जीवात्मा दोनों एक और तद्रूप हैं, इसलिए उनमें भेद करना सम्भव नहीं हैं। उनमें अलग अलग गुणों को युक्त करना भी सम्भव नहीं है।

यह शरीर पाँच तत्वों से निर्मित, सान्त और नाशवान हैं। यह आत्मा से भिन्न हैं। आत्मा अनादि और अन्नत है। यह अविनाशी है। इसने ही इस शरीर का सृजन किया है। इस पर समुचित रूप से विचार करो और आत्मा को जानने का प्रयास करो।

नेति नेति (यह नहीं, यह नहीं) की प्रक्रिया के द्वारा तुम्हें यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि वस्तुतः आत्मा क्या है। इस प्रकार शुभ और अशुभ से मिश्रित संसार का विश्लेषण करते हुए उसके सार को ग्रहण करो और बाकी को ठीक वैसे ही त्याग दो, जैसे पके आम के मीठे रस को ग्रहण कर उसकी गुठली को फेंक दिया जाता है। आत्मा का जन्म या मरण नहीं होता। उसकी शैशव, युवा वृद्धावस्था भी नहीं होती। ramchandra-ji-updesh

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