Home Santo Ki Vani स्वामी विवेकानन्द के विचार / swami vivekananda vichar – vivekananda quotes in hindi

स्वामी विवेकानन्द के विचार / swami vivekananda vichar – vivekananda quotes in hindi

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स्वामी विवेकानन्द के विचार / swami vivekananda vichar – vivekananda quotes in hindi

सन्तो की वाणी

स्वामी विवेकानन्द के विचार

सन्तो की वाणी में आपको भारत के सन्त और महापुरूषों के मुख कही हुवी व लिखे हुवे प्रवचनों की कुछ झलकियां आपके सामने रखेंगे । आप इसे ग्रहण कर आगे भी शेयर करें जिससे आप भी पुण्य के भागीदार बने ।

ध्यान क्या हैं? ध्यान वह बल है, जो हमें इस सब का सामना करने का सामर्थ्य देता है। प्रकृति हमसे कहती है,… अब बदमाश, बैठ और रो ! गर्त में गिर ! मैं कहता हूँ मुझे न रोना है, न गिरना है। मैं उछल पड़ता हूँ…. यह ध्यान की शक्ति हैं। vivekanand-vichar-2

प्रत्येक प्रकृति का अपना मार्ग है। पर सामान्य सिद्धान्त यह है : मन को पकड़ो। मन एक झील के समान है, और उसमें गिरनेवाला हर पत्थर तरंगे उठाता है। ये तरंगे हमें देखने नहीं देती कि हम क्या हैं। ….उसे शान्त होने दो. प्रकृति की तरंगें मत उठाने दो। शांत रहे, और तब कुछ समय बाद वह तुम्हें छोड़ देगी। तब हम जान सकेंगे कि हम क्या हैं।

किसी विषय पर मन को एकाग्र करने का ही नाम ध्यान है। किसी एक विषय पर भी मन की एकाग्रता हो जाने से वह एकाग्रता जिस विषय पर चाहो उस पर लगा सकते हो।… किसी सामान्य बाहरी विषय का भी आश्रय लेकर ध्यान करने का अभ्यास करने से मन की एकाग्रता होती हैं। जिसमें जिसका मन लगता है, उसी के ध्यान का अभ्यास करने से मन शीघ्र एकाग्र हो जाता है।

सभी पैगम्बर, कवि और अन्वेषक महती कल्पनाशक्ति से सम्पन्न थे।… कल्पना प्रेरणा का द्वार और समस्त विचार का आधार है।…

योगी के लिए तीन बड़ी आवश्यकताएँ हैं :

प्रथम – शारीरिक और मानसिक पवित्रता, प्रत्येक प्रकार की मलिनता तथा मन को पतन की और ढकेलने वाली सभी बातों का परित्याग आवश्यक है।

द्वितीय – धैर्य : प्रारम्भ में आश्रर्यजनक दृश्य प्रकट होंगे, पर बाद में वे सब अन्तर्हित हो जाएँगे। यदि धैर्य रखोगे, तो अन्त में सिद्ध सुनिचत है।

तृतीय – लगन : सुख-दुःख, स्वास्थ्य-अस्वास्थ्य सभी दशाओं में साधना में एक दिन का भी नागा न करो।….स्नान के पश्चात बैठ जाओ। आसन दृढ़ रखो अर्थात ऐसी भावना करो कि तुम चट्टान की भाँति दृढ हो, कि तूम्हें कुछ भी विचलित करने में समर्थ नहीं हैं। कंधे, सिर और कमर एक सीधी रेखा में रखो, पर मेरूदण्ड के ऊपर जोर न डालो।… समस्त शरीर के पूर्ण हेने के भाव का चिन्तन करो, यह सोचते हुए कि मुझे सत्य का साक्षात्कार करने के हेतु यह ईश्वर द्वारा प्रदत्त साधन हैं।… इस क्रिया के पश्चात अपनी नासिका के दोनों छिद्रोें से एक दिर्घ श्वास लो और फिर उसे बाहर निकालो। इसके पश्चात जितनी देर तक सरलतापूर्वक बिना श्वास लिये रह सको, रहो। इस प्रकार के चार प्राणायाम करे।

चंचल मन को संयत करके हमें उसे विषयों से खींचना होगा और उसे एक विचार में केन्द्रित करना होगा। बार बार इस क्रिया को करना आवश्यक हैं। vivekanand-vichar-2

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