Home Santo Ki Vani स्वामी विवेकानन्द के विचार / swami vivekananda vichar – vivekananda quotes in hindi

स्वामी विवेकानन्द के विचार / swami vivekananda vichar – vivekananda quotes in hindi

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स्वामी विवेकानन्द के विचार / swami vivekananda vichar – vivekananda quotes in hindi

सन्तो की वाणी

स्वामी विवेकानन्द के विचार

swami vivekananda vichar – vivekananda quotes in hindi

सन्तो की वाणी में आपको भारत के सन्त और महापुरूषों के मुख कही हुवी व लिखे हुवे प्रवचनों की कुछ झलकियां आपके सामने रखेंगे । आप इसे ग्रहण कर आगे भी शेयर करें जिससे आप भी पुण्य के भागीदार बने ।

कार्य अवश्य अच्छा है, पर वह भी तो विचार या चिन्तन से उत्पन्न होता है। शरीर के माध्यम से शक्ति की जो छोटी छोटी अभिव्यक्तियाँ होती हैं, उन्हीं को कार्य कहते हैं। बिना विचार या चिन्तन के कोई कार्य नहीं हो सकता। अतः मस्तिष्क को ऊँचे ऊँचे विचारों, ऊचे ऊँचे आदर्शों से भर लो, और उनको दिन-रात मन के सम्मुख रखो, ऐसा होने पर इन्हीं विचारों से बडे़-बड़े कार्य होंगे। vivekananda-vachan

एक विचार लोः उसी विचार को अपना जीवन बनाओ – उसीका चिन्तन करो, उसीका स्वप्न देखो और उसीमें जीवन बिताओ। तुम्हारा मस्ष्तिक, स्नायु, शरीर के सर्वाड़ग उसीके विचार से पूर्ण रहें। दूसरे सारे विचार छोड़ दो यही सिद्ध होने का उपाय है।

यदि तुम पाँच ही भावों को पचा कर तदनुसार जीवन और चरित्र गठित कर सके हो, तुम्हारी शिक्षा उस आदमी की अपेक्षा बहुत अधिक है, जिसने एक पूरे पुस्तकालय को कंठस्थ कर रखा है।

विचार ही हमारी कार्य-प्रवृत्ति का नियामक है। मन को सर्वोच्च विचारों से भर लो, दिन पर दिन यही सब भाव सुनते रहो, मास पर मास इसीका चिन्तन करो। पहले-पहल सफलता न भी मिले. पर कोई हानि नहीं, यह असफलता तो बिल्कुल स्वाभाविक है, यह मानव जीवन का सौन्दर्य है। इन असफलताओं के बिना जीवन क्या होता ? यदि जीवन में इस असफलता को जय करने की चेष्टा न रहती तो जीवन धारण करने का कोई प्रयोजन ही न रह जाता। उसके न रहने पर जीवन का कवित्व रहता?

केवल सत्कार्य करते रहो, सर्वदा पवित्र चिन्तन करोः असत संस्कार रोकने का बस यही एक उपाय हैं।

याद रखो कि जिस प्रकार तुम्हारे असत्-विचार और असत्-कार्य शेरों की तरह तुम पर कूद पड़ने की ताक में हैं, उसी प्रकार तुम्हारे सत्-विचार और सत्-कार्य भी हजारों देवताओें की शक्ति लेकर सर्वदा तुम्हारी रक्षा के लिए तैयार हैं।

बचपन से ही उनके मस्तिष्क में इस प्रकार के विचार प्रविष्ट हो जायँ, जिनसे उनकी यथार्थ सहायता हो सके, जो उनको सबल बना दें, जिनसे उनका कुछ यथार्थ हित हो।
स्थूल दृष्टि से देखने पर कुविचारों की रोगबीजाणु कहा जा सकता है।

शरीर अपने पीछे निहित विचार द्वारा निर्मित होता है।

हम शुभ और अशुभ विचारों के उत्तराधिकारी हैं। यदि हम अपने को निर्मल बना लें और शुभ विचारां का निमित्त बना लें, तो ये हममें प्रवेश करेंगे। पवित्रात्मा व्यक्ति अशुभ विचारों को ग्रहण नहीं कर सकता । अशुभ विचारों को पापी जनों के यहाँ सर्वात्तम आश्रय मिलता है । वे बीजाणुओं जैसे है, जो उपयुक्त क्षेत्र मिलने पर ही अंकुरित होते और पनपते हैं।

मैं हीन हूँ मैं दीन हूँ ऐसा कहते कहते मनुष्य वैसा ही हो जाता है। vivekananda-vachan

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